पिता के अंतिम संस्कार में जाने के लिए नहीं थे पैसे, घर चलाने के लिए सड़क पर बेचीं चूड़ियां, जानिए IAS Ramesh Gholap की कहानी

IAS Ramesh Gholap: यूपीएससी की परीक्षा में हर साल लाखों की संख्या में उम्मीदवार बैठते हैं लेकिन इस परीक्षा में पास कुछ उम्मीदवार ही हो पाते हैं। देश की सबसे कठिन परीक्षा यूपीएससी को पास करने के लिए कठिन परिश्रम और दृढ़ निश्चय की आवश्यकता पड़ती है। हालांकि कुछ ऐसे अभ्यर्थी होते हैं जो कि अपनी गरीबी से लड़ते हुए भी अपने सपने को पूरा कर दिखाते हैं।
आज हम आपको रमेश घोलप की कहानी बताएंगे। रमेश ने बचपन में गरीबी और पोलिया का दंश झेला। लेकिन कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और आगे बढ़ने के लिए लगातार मेहनत करते रहे। तो आईए जानते हैं रमेश घोलप की कहानी।
बचपन में हो गए पोलियो के शिकार (IAS Ramesh Gholap)

रमेश घोलप (IAS Ramesh Gholap) महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के एक छोटे से गांव के रहने वाले हैं। बचपन में ही रमेश के सर से उनके पिता का साया उठ गया। मां ने जैसे तैसे मेहनत मजदूरी करके अपने बेटे की परवरिश शुरू कर दी। रमेश अपना घर चलाने के लिए अपनी मां के साथ सड़क पर चूड़ियां बेचा करते थे। हालांकि उनका इम्तिहान यहीं खत्म नहीं हुआ। बचपन में ही पोलियो की वजह से रमेश ने अपना एक पर खो दिया और पैसे की कमी होने की वजह से उनकी मां उनका इलाज नहीं कर पाई।
कठिन परिस्थितियों के आगे रमेश ने नहीं मानी हार

कठिन परिस्थितियों के बावजूद रमेश घोलप ने कभी हार नहीं मानी। अपने दृढ़निश्चय और मेहनत के दम पर 2012 में सिविल सेवा परीक्षा में 287वां स्थान हासिल किया। रमेश ने जीवन की हर कठिनाइयों से लड़ते हुए अपनी सफलता की कहानी लिख दी।
पढ़ाई के लिए छोड़ना पड़ा गांव
रमेश ने पढ़ाई के लिए अपना गांव छोड़ दिया और अपने चाचा के पास चले गए। 12वीं में जब रमेश थे तब उनके पिता की मृत्यु हो गई। चाचा के घर से अपने गांव आने के लिए रमेश को ₹2 की जरूरत थी लेकिन उनके पास उसे समय ₹2 भी नहीं थे।इसलिए अपने पिता की अंतिम संस्कार में भी रमेश शामिल नहीं हो पाए।
पहले प्रयास में असफल रहे
12वीं की पढ़ाई के बाद रमेश ने डिप्लोमा किया और घर की जिम्मेदारी में हाथ बटाने लगे। उन्होंने गांव में ही पढ़ाना शुरू कर दिया। इसके बाद रमेश ने यूपीएससी की परीक्षा देने के बारे में सोचा लेकिन पहले प्रयास में उन्हें असफलता मिली। फिर उनकी मां ने गांव वालों से उधार लेकर उन्हें पढ़ने के लिए दिल्ली भेज दिया।
2012 में IAS बने रमेश
दिल्ली जाने के बाद रमेश लगातार मेहनत करने लगे और मुश्किलों के आगे उन्होंने हार नहीं मानने की ठान ली। आखिरकार उन्हें 2012 में सफलता मिली और यूपीएससी की परीक्षा में वह 296 वीं रैंक हासिल की है और विकलांग कोटा से आईएएस ऑफिसर बन गए।



