Betul News : मंडी प्रशासन ने प्रभारी मंत्री के आदेश रद्दी की टोकरी में डाले, एक माह में भी व्यपारियों से नही वसूला जुर्माना
Betul News: Mandi administration throws minister-in-charge's orders into dustbin, fails to collect fines from traders even in a month

Betul News : बैतूल की कृषि उपज मंडी अब मंडी नहीं, बल्कि व्यापारियों की निजी जागीर बन चुकी है। यहां न कानून का डर है, न सरकार के आदेशों की इज्जत। प्रभारी मंत्री,विधायक और कलेक्टर—तीनों की मौजूदगी और सख्ती भी मंडी व्यवस्था को पटरी पर नहीं ला सकी। प्रशासन पूरी तरह फेल है और मंडी में खुलकर व्यापारियों की तानाशाही चल रही है।
8 जनवरी को प्रभारी मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल ने औचक निरीक्षण कर मंडी की बदहाली को अपनी आंखों से देखा था। निरीक्षण के दौरान मंत्री इस कदर नाराज हुए कि अधिकारियों को कड़ी फटकार लगानी पड़ी। मंत्री ने साफ-साफ आदेश दिए थे कि शेड में अवैध रूप से अनाज के बोरे जमा करने वाले सभी व्यापारियों पर तत्काल जुर्माना ठोका जाए।
लेकिन एक महीने बाद सच्चाई यह है कि एक भी व्यापारी पर न कार्रवाई हुई, न जुर्माना वसूला गया। मंत्री के आदेशों को मंडी प्रशासन ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।
व्यापारी शेड में कर रहे ऐश, किसान खुले आसमान के नीचे बेहाल
मंडी में तस्वीर शर्मनाक है। व्यापारियों का अनाज सुरक्षित शेड के भीतर पड़ा है, जबकि किसान अपनी उपज खुले में धूप-बारिश झेलने को मजबूर हैं। किसान घंटों, कभी-कभी पूरी रात मंडी में बैठे रहते हैं, लेकिन न तो नीलामी समय पर होती है और न ही भुगतान की कोई गारंटी।
नोटिस का ढोंग, कार्रवाई जीरो
कार्रवाई के नाम पर मंडी प्रशासन केवल कागजी नोटिस का नाटक कर रहा है। हद तो तब हो गई जब मंडी सचिव को ही यह नहीं पता कि कितने व्यापारियों को नोटिस दिए गए। इससे साफ है कि नोटिस सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए हैं। जुर्माना वसूलने की हिम्मत मंडी प्रशासन में नहीं है।
निरीक्षण पर्यटन बनकर रह गए
प्रभारी मंत्री, और कलेक्टर—सब मंडी का चक्कर लगा चुके हैं। हर बार अव्यवस्था पर नाराजगी, कैमरों के सामने फटकार और फिर सन्नाटा। अधिकारियों के जाते ही मंडी फिर से व्यापारियों के हवाले हो जाती है। किसानों की शिकायतें बार-बार अनसुनी की जा रही हैं।
किसान पूछ रहा है: सरकार है या सिर्फ दिखावा?
जब प्रभारी मंत्री के आदेशों की खुलेआम अवहेलना हो रही है, तो साफ है कि मंडी प्रशासन पूरी तरह व्यापारियों के आगे घुटने टेक चुका है। सवाल यह है कि अन्नदाता आखिर कहां जाए? क्या किसान की मेहनत की कोई कीमत नहीं और क्या कृषि मंडी सिर्फ व्यापारियों की गुलाम बनकर रह गई है?



